ऑटोमोबाइल डेस्क:
भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार और वाहन मालिकों के बीच इन दिनों ‘E20 पेट्रोल’ को लेकर एक बहुत बड़ी बहस छिड़ी हुई है। देश में पर्यावरण अनुकूल ईंधनों को बढ़ावा देने और कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता को कम करने के लिए सरकार तेजी से पेट्रोल में इथेनॉल मिक्सिंग (सम्मिश्रण) की मात्रा को बढ़ा रही है। हालांकि, इस नए बदलाव के बाद से कई वाहन चालकों और तकनीकी विशेषज्ञों ने गाड़ियों के इंजन की उम्र और माइलेज को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर करना शुरू कर दिया है। सोशल मीडिया और वीडियो प्लेटफॉर्म्स पर भी इसे लेकर तरह-तरह के दावे किए जा रहे हैं।
जब हम भारत में इस तकनीक को अपनाने की बात करते हैं, तो यह जानना भी बेहद जरूरी हो जाता है कि दुनिया के अन्य विकसित और विकासशील देश इस तकनीक का इस्तेमाल किस तरह कर रहे हैं। क्या वहां भी भारत की तरह ही पेट्रोल में इथेनॉल मिलाया जाता है, या फिर उनका पेट्रोल मॉडल हमसे बिल्कुल अलग है? आज के इस विशेष और गहराई से शोध किए गए लेख में हम भारत से लेकर जापान, अमेरिका और ब्राजील जैसे देशों के इथेनॉल मिक्सिंग मॉडल का पूरा तुलनात्मक विश्लेषण करेंगे और जानेंगे कि यह ईंधन आपकी गाड़ी के लिए कितना सुरक्षित है।
E20 पेट्रोल क्या है और भारत में इसे लेकर क्यों छिड़ी है बहस?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि E20 पेट्रोल आखिर है क्या। साधारण शब्दों में कहें तो E20 का मतलब है ऐसा ईंधन जिसमें 80 प्रतिशत पारंपरिक पेट्रोल और 20 प्रतिशत इथेनॉल (जो मुख्य रूप से गन्ने और अनाज से तैयार होने वाला एक प्रकार का अल्कोहल है) मिलाया गया हो। सरकार का लक्ष्य है कि साल 2025-26 तक पूरे देश में केवल E20 पेट्रोल ही उपलब्ध कराया जाए ताकि देश का पैसा बचे और प्रदूषण में भी कमी आए।
वाहन मालिकों और विशेषज्ञों की चिंता: क्या सच में कम हो रहा है माइलेज?
भले ही यह कदम पर्यावरण के लिए बेहतर हो, लेकिन आम वाहन चालकों के लिए यह कुछ परेशानियां लेकर आया है। कई पुराने वाहन चालकों का दावा है कि E20 पेट्रोल का इस्तेमाल करने के बाद से उनकी गाड़ियों के माइलेज में 5 से 10 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है। इसके अलावा, तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि जो गाड़ियां इस ईंधन के अनुकूल (कंपैटिबल) नहीं बनी हैं, उनके इंजन के रबर पार्ट्स और पाइप्स इस इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की वजह से जल्दी खराब हो सकते हैं। हालांकि, तेल कंपनियों का स्पष्ट कहना है कि नए वाहनों के इंजन को इसी तरह से डिजाइन किया गया है कि उन पर इसका कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा।
ग्लोबल मॉडल: दुनिया के अन्य बड़े देशों में इथेनॉल मिक्सिंग का क्या है हाल?
दुनिया भर में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए अलग-अलग देशों ने अपने-अपने स्तर पर इथेनॉल ब्लेंडिंग के नियमों को लागू किया है। आइए जानते हैं कि कौन सा देश इस रेस में कहाँ खड़ा है:
ब्राजील का मॉडल: जहां 100% इथेनॉल से भी चलती हैं गाड़ियां
इथेनॉल मिक्सिंग के मामले में ब्राजील पूरी दुनिया का सिरमौर और सबसे बड़ा उदाहरण है। ब्राजील में सामान्य तौर पर बिकने वाले पेट्रोल में न्यूनतम 27 प्रतिशत इथेनॉल (E27) मिलाना कानूनी रूप से अनिवार्य है। इसके अलावा, वहां ‘फ्लेक्स-फ्यूल’ तकनीक इतनी विकसित हो चुकी है कि लोग अपनी गाड़ियों में 100 प्रतिशत शुद्ध इथेनॉल (E100) डालकर भी बिना किसी परेशानी के गाड़ी चलाते हैं। वहां का पूरा ऑटोमोबाइल बाजार इसी ईंधन के इर्द-गिर्द घूमता है।
अमेरिका में स्थिति: E10 और E15 का बड़े पैमाने पर उपयोग
अमेरिका में भी इथेनॉल का बहुत बड़ा बाजार है। वहां के अधिकांश पेट्रोल पंपों पर E10 पेट्रोल (10% इथेनॉल) बहुत ही सामान्य ईंधन है। इसके अलावा, साल 2001 के बाद बने वाहनों के लिए वहां E15 पेट्रोल (15% इथेनॉल) का उपयोग भी धड़ल्ले से किया जाता है। अमेरिका अपनी मक्का (कॉर्न) की फसल से बड़े पैमाने पर इथेनॉल का उत्पादन करता है, जिससे उनके कृषि क्षेत्र को भी बहुत फायदा मिलता है।
पड़ोसी देश नेपाल और कनाडा का गणित
हमारे पड़ोसी देश नेपाल और पश्चिमी देश कनाडा ने भी पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए इथेनॉल मिक्सिंग के नियमों को अपनाया है। कनाडा के अलग-अलग प्रांतों के नियमों के अनुसार वहां E5 से लेकर E12 तक का इस्तेमाल किया जाता है, जबकि नेपाल भी धीरे-धीरे E10 पेट्रोल की तरफ अपने कदम बढ़ा रहा है।
जापान का मॉडल: तकनीक में आगे लेकिन इथेनॉल मिक्सिंग में सबसे पीछे क्यों?
जापान दुनिया की सबसे बेहतरीन ऑटोमोबाइल तकनीक बनाने के लिए जाना जाता है, लेकिन जब बात इथेनॉल मिक्सिंग की आती है, तो जापान इस रेस में काफी पीछे नजर आता है। जापान ने साल 2030 तक केवल E10 पेट्रोल (10% इथेनॉल) तक पहुंचने का बहुत ही धीमा लक्ष्य रखा है। इसका मुख्य कारण यह है कि जापान के पास इथेनॉल बनाने के लिए कच्चे माल (जैसे गन्ना या मक्का) की भारी कमी है, और वे पूरी तरह से आयातित इथेनॉल पर निर्भर नहीं होना चाहते।
पेट्रोल में इथेनॉल मिक्सिंग बढ़ाने के क्या फायदे और नुकसान हैं?
इस तकनीक के जितने आर्थिक और पर्यावरणीय फायदे हैं, उतने ही कुछ व्यावहारिक नुकसान भी हैं:
- फायदे:
- आयात बिल में भारी कमी: भारत को कच्चे तेल के लिए दूसरे देशों को अरबों डॉलर का भुगतान करना पड़ता है। इथेनॉल मिक्सिंग से इस खर्च में भारी बचत होती है।
- किसानों को लाभ: इथेनॉल गन्ने और खराब अनाज से बनता है, जिससे देश के किसानों को उनकी फसल का बेहतर दाम मिलता है।
- कम प्रदूषण: पारंपरिक ईंधन की तुलना में इथेनॉल के जलने से हानिकारक गैसों का उत्सर्जन बहुत कम होता है।
- नुकसान:
- माइलेज की कमी: इथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में ऊर्जा घनत्व (Energy Density) कम होता है, जिसके कारण गाड़ी चलाने में थोड़ी अधिक ईंधन की खपत होती है।
- इंजन पर असर: पुरानी गाड़ियां जो E20 अनुकूल नहीं हैं, उनके इंजन के धातु और रबर के हिस्सों में जंग लगने या उनके गलने का खतरा बना रहता है।
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क्या मेरी पुरानी कार या बाइक में E20 पेट्रोल डाला जा सकता है?
यदि आपकी गाड़ी साल 2023 से पहले की बनी है, तो उसमें लगातार E20 पेट्रोल डालने से बचना चाहिए, क्योंकि पुराने इंजन के पार्ट्स इस उच्च इथेनॉल मिश्रण को झेलने के लिए नहीं बने हैं। हालांकि, कभी-कभार इस्तेमाल से कोई बड़ा नुकसान नहीं होता।
क्या E20 पेट्रोल के इस्तेमाल से गाड़ी का माइलेज वाकई कम हो जाता है?
हाँ, तकनीकी रूप से इथेनॉल में शुद्ध पेट्रोल की तुलना में कम कैलोरीफिक वैल्यू होती है। इस वजह से E20 पेट्रोल के इस्तेमाल से गाड़ी के माइलेज में लगभग 3 से 6 प्रतिशत तक की मामूली गिरावट देखी जा सकती है।
दुनिया में सबसे ज्यादा इथेनॉल मिक्सिंग किस देश में होती है?
दुनिया में सबसे ज्यादा इथेनॉल मिक्सिंग ब्राजील में होती है, जहां सामान्य पेट्रोल में भी कम से कम 27% इथेनॉल मिलाया जाता है और वहां कई गाड़ियां 100% इथेनॉल पर भी चलती हैं।
क्या E20 पेट्रोल से प्रदूषण सचमुच कम होता है?
हाँ, पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने से कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन जैसी हानिकारक गैसों का उत्सर्जन लगभग 30 से 40 प्रतिशत तक कम हो जाता है, जो पर्यावरण के लिए बेहद फायदेमंद है।
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