शेयर बाजार से टाटा-टाटा, बाय-बाय! FPIs ने सितंबर में निकाले 45,536 करोड़ रुपये, जानिए क्यों मची भगदड़ और क्या है एक्सपर्ट्स की राय
मुख्य बिंदु
भारतीय शेयर बाजार (Stock Market) से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI/FII) की निकासी को लेकर इस वक्त देश भर के वित्तीय गलियारों में बड़ी हलचल मची हुई है। हाल ही में सामने आए आंकड़ों के अनुसार, विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजारों से ताबड़तोड़ पैसा बाहर निकालना शुरू कर दिया है, जिससे निवेशकों की चिंताएं काफी बढ़ गई हैं। सितंबर महीने में अकेले FPIs ने भारतीय इक्विटी बाजार से ₹45,536 करोड़ से अधिक की भारी-भरकम रकम निकाल ली है।
आइए जानते हैं इस भारी बिकवाली के पीछे की मुख्य वजहें और दिग्गज अर्थशास्त्रियों ने इसके बारे में क्या बड़े खुलासे किए हैं:
1. सितंबर में FPIs ने निकाले ₹45,536 करोड़
- बड़ी निकासी का आंकड़ा: डिपॉजिटरी के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, विदेशी निवेशकों (FPIs) ने सितंबर के महीने में भारतीय शेयर बाजार से कुल ₹45,536 करोड़ की शुद्ध बिकवाली (Net Outflow) की है।
- बाजार पर दबाव: इस भारी-भरकम बिकवाली के चलते घरेलू शेयर बाजार के बेंचमार्क इंडेक्स पर लगातार दबाव बना हुआ है, और निवेशकों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर अचानक बाजार से यह भगदड़ क्यों मच गई है।
2. विदेशी निवेशकों द्वारा पैसा निकालने के मुख्य कारण (Why FPIs Outflows?)
- वैश्विक बाजारों में बदलाव: अमेरिका और अन्य विकसित देशों में बॉन्ड यील्ड (Bond Yields) और ब्याज दरों से जुड़े समीकरणों के कारण विदेशी निवेशकों का रुझान भारतीय बाजारों से हटकर अन्य सुरक्षित विकल्पों की ओर गया है।
- वैल्यूएशन की चिंता: कई ग्लोबल एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारतीय शेयरों का वैल्यूएशन (Valuation) अपने ऐतिहासिक उच्च स्तर के आसपास चल रहा था, जिसके चलते विदेशी संस्थागत निवेशकों ने प्रॉफिट बुकिंग (Profit Booking) करना बेहतर समझा।
3. दिग्गज अर्थशास्त्रियों की राय: ‘भारत पर पूरा भरोसा, फिर भी क्यों बंद हैं गेट?’
- लंबी अवधि का नजरिया मजबूत: तमाम दिग्गज अर्थशास्त्रियों और मार्केट एक्सपर्ट्स का साफ कहना है कि भारत की अर्थव्यवस्था (Indian Economy) के फंडामेंटल्स और लॉन्ग-टेरर ग्रोथ स्टोरी पर विदेशी निवेशकों का भरोसा आज भी पूरी तरह से कायम है।
- अस्थाई रुख: अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह निकासी वैश्विक पोर्टफोलियो री-बैलेंसिंग और शॉर्ट-टर्म ग्लोबल फैक्टर्स का नतीजा है, जिसे किसी स्थायी मंदी के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। बाजार के जानकारों के अनुसार, जैसे ही वैश्विक परिस्थितियां अनुकूल होंगी, विदेशी निवेशक एक बार फिर भारतीय बाजारों में वापसी कर सकते हैं।
